इंतेज़ार

तुम हो कितनी अनोखी,जब आती फ़िज़ा को

खुबसूरत और शमाँ में अनोखी सी नमी आ जाती।

बस झुल्फों को संभाल कर चलना,

थोड़ा देखभालकर चलना,

मौसम का मिज़ाज़ ना बिगड़ जाये, इसीलिए तो

कहते है हमें भी साथ ले लेकर चलना,

क्या पता हमे फ़राज़ ही मिल जाये।

हर शाम साथ रहे ये जरूरी तो नही, हर सुबह

साथ हो ये जरूरी तो नही, बस तेज़ हवाओ में

साथ रहना ये जरूरी है सही।

रखते हो सब नज़रे तुमपे सही! दिलो में कई

अरमान लिए, उन नज़रो में एक नज़र ऐसी भी,

जिसपे हो बस तेरी नज़र, जिसपे हो बस मेरी नज़र।

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जिस राह चल पड़ा था

किस राह चल पड़ा था!

ना था कोई मोड़ ना थी कोई मंज़िल,

जिस राह चल पड़ा था।

कभी दिखे कुछ काटे,

तो कभी पतझड़

अपने ख़यालो में खोया,

खुद ही सवालो को पिरोया,

बस चला जा रहा था,

जिस राह चल पड़ा था।

आ पहुँचा उस जगह जहा दिखे अनेकों लोग,

कुछ सुलझे तो कुछ अपने आप में ही उलझे।

जब लगा जीवन का मोल, हर राह लगा अनमोल,

हर राह एक नयी मंजिल, हर मंजिल में एक नयी राह।

बस चलता रहा जब तक थका नही, जब तक रुका नही।

जिस राह चल पड़ा था।

कैद में आशाएँ

क्यों करते हो कैद ?

वो तो उड़ने को है,

क्यों रखते हो पिंजरे में ?

वो तो उड़ने को है।

गर खोल दो बंदिशो का पिंजरा एक बार,

वो तो दूर गगन में उड़ने को है बेकरार।

जिसकी हसी जंजीरो से हो बधी,

जो खिलखिलाने से दुनिया से हो डरी,

वो खिलखिला के हसने को है।

क्यों करते हो कैद ?

वो तो उड़ने को है।

कही देर ना हो जाए, सिर्फ पिंजड़ा ही रह जाए,

और पंख सारे गिर वही ना रह जाए।

पिंजड़े को ही मान संसार,

दबा दे सारे बुने हुए अपने अरमान।

क्यों करते हो कैद?

वो तो उड़ने को है।

” मेरी माँ”

जब छोटा था तो पास थी

धूप मे छाव थी, ठंड मे अलाव थी

उम्र बढ़ी तो दूर हुआ, पढ़ाई और नौकरी की तलाश थी

दूरिया कितनी भी हो दिल और दुआओ मे हमेसा साथ है

दूर तो सब होते है लेकिन उसे मुझसे बहोत आस है

वो मेरी माँ है, वो मेरी माँ है।

“जीवन रेखा”

कितनी छोटी है ये जीवन की रेखा,

हर दिन एक नये दिन के इंतज़ार मे रहती

हर दिन एक नया मोड़ दिखाती , हर मोड़ पे

कोई कहानी बनाती, कभी हँसाती , कभी रुलाती,

कभी यादे बनाती , कभी यादो को भूलती

कितनी छोटी है ये जीवन की रेखा, कभी कोई नया

मुकाम दिखती तो कभी धरातल पे ला गिराती

उल्लझने तो बहुत सी होती है जीवन मे,

लेकिन हर दिन सुलझाने का सलिका सीखा जाती

और पीछे कई कहानियां छोड़ जाती,

कितनी छोटी है ये जीवन की रेखा।

Friend zone

जब देखा तुझे पहली दफा, दिल करे देखु हर मर्तबा

एक उम्मीद सी बन गयी थी सीने मे,

क्या खूब वजह मिल गयी थी जीने की

फिर सुरु दौर लब्जो का, नजरो का

दौर था कई मंजरो का

रात होती, फिर कुछ बात होती

हमे क्या पता था, ये जो दिल है मन ही मन बहोत ओझिल है

बहोतसि बाते थी सीने मे,…हम कह ना सके वो समझ ना सके

फिर हुआ इजहार , हमने कहा “मौत्तरमा” हमे हो गया है आपसे प्यार,

उन्होंने ने कहा, “भाईसाहब” ….आप हो मेरे सिर्फ यार।